Mar 29, 2012

मनोवांछित फल देती हैं राज राजेश्वरी

Mar 29, 2012 |

सुनील कुमार मिश्र, मधुबनी : भगवती राज राजेश्वरी भक्तों को मनोवांछित फल देती हैं। सच्चे मन से प्रार्थना करने वाले हर भक्त की वे विनती सुनते हैं। इन पर लोगों की अगाध श्रद्धा है। खास कर शारदीय व वासंतिक नवरात्र में दूर -दूर से लोग मां के दर्शन व पूजन को यहां पहुंचते हैं।
मधुबनी जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर उत्तर एक निर्जन स्थल में राजेश्वरी पार्वती भोलेनाथ के साथ प्रागैतिहासिक काल से विराज रही है। दु:ख हरने वाली के रुप में प्रसिद्धि के कारण लोग इस स्थान को डोकहर भी कहते हैं। मंदिर के पश्चिमोत्तर भाग में प्राकृतिक बिंदुसर नामक सरोवर है। जिसमें लाल कमल फूल खिले रहते हैं। आदिशक्ति मातृ देवी पार्वती सदाशिव भोले नाथ के साथ भक्तों पर आशीष की वर्षा करती हैं। ऐसा विश्वास है कि यहां से खाली हाथ कोई नहीं लौटता।
मंदिर तिरहुत नागर शैली की है। जो दरभंगा के महाराज महेश्वर सिंह(1850-60)द्वारा निर्मित कहा जाता है। जिसे पूर्व में राजा राघव सिंह के बबुआन भाई नंद नंदन सिंह ने 1725 के आसपास बनाया था। मंदिर परिसर में गौरी कुंड है। राज राजेश्वरी यहां परब्रह्म की महाशक्ति के रुप में प्रागैतिहासिक काल से पूजित हैं। आदि काल से मिथिला भूमि में पार्वती पूजन की परंपरा रही है। इस शक्तिपीठ की प्राचीनता के साथ साथ वर्तमान गौरीशंकर की युगलमूर्ति भी प्राचीन है। कहा जाता है कि बुद्ध काल में ब्राह्मण धर्म का विरोध होने पर देव विग्रह को बचाने के लिए निकट के चंद्रभागा नदी में डाल दिया होगा। जिसे बाद में संक्रमण काल के समाप्त होने पर पुन: मंदिर बना कर स्थापित कर दिया गया। यहां के पुजारी ने कहा कि साठ-सत्तर वर्ष पूर्व मंदिर के आसपास भारी जंगल था। जहां शाम के बाद सन्नाटा रहता था। इस शक्तिपीठ को मैथिली सीता व विदेह जनक द्वारा पूजित होने की बात कही जाती है। यहां शारदीय नवरात्र के दशमी को पूजा के बाद सैकड़ों भक्तों के साथ शंख व घंटा घड़ियाल बजाते हुए नील कंठ पक्षी के दर्शन को निकलते हैं और जहां दर्शन हो जाता है पूजा कर वापस मंदिर लौट जाते हैं।


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